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निशाने पर यूपी की नौकरशाही,सहगल के 112 करोड़ का कमीशन नेटवर्क चर्चा में

नीरज श्रीवास्तव

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में तीन दशकों से अधिक समय से सत्ता और प्रशासन के केंद्र में रहे 1988 बैच के रिटायर्ड आईएएस अधिकारी और पूर्व प्रसार भारती चेयरमैन नवनीत कुमार सहगल के कथित 112 करोड़ रुपये के कमीशन नेटवर्क को लेकर सूबे की नौकरशाही निशाने पर है। एक गोपनीय इनकम टैक्स रिपोर्ट और उस पर आधारित मीडिया खुलासों के बाद से सहगल का नाम सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में कथित भ्रष्टाचार के सबसे बड़े लाभार्थी के तौर पर लिया जा रहा है।

गोपनीय 254 पन्नों की इनकम टैक्स (इन्वेस्टिगेशन विंग) रिपोर्ट में दावा है कि 2019-20 से 2021-22 के बीच यूपी सरकार की योजनाओं,खासकर वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ओडीओपी), विश्वकर्मा श्रम सम्मान, आईइडी और यूपीकान जैसी संस्थाओं से जुड़े ट्रेनिंग, टूलकिट और कंसल्टेंसी कॉन्ट्रैक्ट्स में व्यवस्थित तौर पर “कट मनी सिस्टम” चला, जिसके जरिए करीब 112 करोड़ रुपये का कथित कमीशन निकाला गया। कमीशन लेने वाले के नाम के तौर पर एनस दर्ज है। एक प्रतिष्ठान ने तो पैसे जमा करने वाली अपनी गोपनीय डायरी मे एनएस के साथ लम्बू भी लिख रखा है। रिपोर्ट के मुताबिक नकदी बरामदगी, संदिग्ध शेल कंपनियों के जरिए प्रॉपर्टी खरीद, महंगे तोहफों के संदेश और कॉन्ट्रैक्ट पेमेंट की चेन जैसे विभिन्न साक्ष्य इस नेटवर्क की ओर इशारा करते हैं और सहगल को इस पिरामिड के शीर्ष पर दिखाया गया है।
कांग्रेस ने दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस रिपोर्ट का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि सहगल को तीन साल में 24 से 26 करोड़ रुपये तक की “कट मनी” मिली और इसके बावजूद उन्हें रिटायरमेंट के बाद प्रसार भारती के शीर्ष पद पर नियुक्त किया गया। पार्टी के मुताबिक आईइडी से लगभग 65 करोड़ और यूपीकान से लगभग 46 करोड़ रुपये कथित रूप से लिए गए, जिनका बड़ा हिस्सा नौकरशाहों और बिचौलियों के बीच बंटने का आरोप है।
 इन आरोपों के सार्वजनिक होने के कुछ ही समय बाद सहगल ने प्रसार भारती चेयरमैन पद से कार्यकाल पूरा होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया, जिसने अफसरशाही और सियासी हलकों में अटकलों को और हवा दी। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने सवाल उठाया कि जब आयकर विभाग की रिपोर्ट राज्य सरकार और लोकायुक्त तक भेजे जाने की बात कही गई है तो न तो यूपी सरकार ने स्पष्ट कार्रवाई की, न ही प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस पर सार्वजनिक स्पष्टीकरण दिया।
इन खुलासों और राजनीतिक हमलों के बाद यूपी कैडर की नौकरशाही में सहगल का नाम फुसफुसाहट से खुली चर्चा तक पहुंच गया है, जहां इसे “सिस्टमेटिक करप्शन” और “पोस्ट-रिटायरमेंट पोस्टिंग” की राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। सोशल मीडिया पर भी इनकम टैक्स डॉसियर की लिंक, मीडिया रिपोर्टें और कांग्रेस के आरोप तेजी से शेयर हो रहे हैं, जिससे यह संकेत जा रहा है कि उच्च स्तर पर लिए गए फैसलों और जवाबदेही की कमी पर सवाल अब सिर्फ बंद कमरों तक सीमित नहीं रहे। उधर, उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार सहगल सभी आरोपों से इनकार करते हुए कहते रहे हैं कि आयकर विभाग की जांच बंद हो चुकी है।
कौन है नवनीत सहगल
उत्तर प्रदेश की नौकरशाही में नवनीत सहगल की भूमिका तीन दशकों से अधिक समय से सत्ता और प्रशासन के केंद्र में रही है; उन्हें अक्सर “हर मौसम का अफसर” और तीन-तीन मुख्यमंत्रियों के भरोसेमंद संकट प्रबंधक के रूप में देखा गया। विकास परियोजनाओं, सरकारी छवि प्रबंधन और अब हालिया भ्रष्टाचार विवाद,इन तीनों परतों ने मिलकर उनकी छवि को बेहद प्रभावशाली और विवादास्पद दोनों बनाया है।
तीन सरकारों के भरोसेमंद अफसरसहगल 1988 बैच के यूपी कैडर के आईएएस हैं, जिन्हें मायावती, अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ,तीनों सरकारों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलती रहीं, जबकि सत्ता बदलने पर थोड़े समय के लिए ही उन्हें हाशिए पर भेजा गया। उन्हें “क्राइसिस मैनेजर” और “ऑल सीज़न्स ब्यूरोक्रेट” कहा जाता रहा, जो अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारों के लिए भी कामन फैक्टर बने रहे और अफसरशाही के भीतर मजबूत नेटवर्क और राजनीतिक ट्यूनिंग के लिए जाने गए।
प्रमुख विभाग और प्रोजेक्ट
मायावती सरकार (2007-12) में वे मुख्यमंत्री के सचिव, शहरी विकास, एस्टेट्स आदि कई अहम विभागों के प्रभारी रहे और एक समय 10 से 12 महत्वपूर्ण विभाग उनके पास केंद्रित रहे। अखिलेश सरकार में पहले धार्मिक कार्य विभाग की “सजा पोस्टिंग” मिली, लेकिन जल्दी ही सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के प्रमुख बनाकर लखनऊदृ-आगरा एक्सप्रेसवे जैसे ड्रीम प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी दी गई, जिसे रिकॉर्ड समय में पूरा कराने का श्रेय उन्हें दिया जाता है।
योगी सरकार के दौर में उन्हें खादी एवं ग्रामोद्योग, एक्सपोर्ट प्रमोशन, ओडीओपी जैसी फ्लैगशिप योजनाओं की जिम्मेदारी दी गई, फिर सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग की कमान भी सौंपी गई, अंत में वे खेल विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव के रूप में स्पोर्ट्स पॉलिसी 2023 तैयार कर रिटायर हुए। रिटायर होने के बाद मार्च 2024 में उन्हें प्रसार भारती बोर्ड का चेयरमैन नियुक्त किया गया, जिसे उनकी प्रशासनिक क्षमता और राजनीतिक स्वीकृतिकृ दोनों की स्वीकृति माना गया। दिसंबर 2025 में उनका अचानक इस्तीफा और समान समय पर उभरे भ्रष्टाचार के आरोपों ने यूपी की ब्यूरोक्रेसी के भीतर यह संदेश दिया कि शीर्ष स्तर के अफसर भी अब जांच और राजनीतिक हमलों के घेरे से पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं, हालांकि आधिकारिक स्तर पर अभी तक कोई ठोस अभियोजन या अनुशासनात्मक कार्रवाई सार्वजनिक नहीं हुई है।

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