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आईएएस न होते तो एक बेमिसाल सिंगर होते महाराष्ट्र के मुख्य सचिव मनु श्रीवास्तव

  • लविवि के 102 वें स्थापना दिवस पर सम्मानित हुए मनु श्रीवास्तव
  • सफल प्रशासक के साथ ही सुरीली आवाज के मालिक भी है मनु
  • संगीत और मनपसंद गाने गाना ही पसंद
  • सफल होने के लिए अर्जुन बनना चाहिए-मनु
  • सिर्फ लक्ष्य पर निशाना हो तो परिणाम असंभव नहीं-मनु
  • बदलते माहौल में ब्यूरोक्रेसी की चुनौतियां भी बढ़ी हैं-मनु
  • सरकार और अफसरशाही में तालमेल जरूरी है-मनु
  • मेरे बेटे में अहंकार नहीं- माया श्रीवास्तव
  • क्लास 3 से एमएससी तक कक्षा में टॉपर ही रहे हैं मनु- यूएस श्रीवास्तव

मुंबई,नवसत्ताः नैक ग्रेडिंग में ट्रिपल ए पाने वाले लखनऊ विश्वविद्यालय के 102 वें स्थापना दिवस पर तमाम लोगों का जमावड़ा लगा। छात्र छात्राओं शिक्षकों और स्टाफ के अलावा पुराने स्टूडेंट्स भी समारोह की शान रहे, जिसमें बहुत से ऐसे छात्र छात्राएं थीं जो आज अपने मुकाम पर हैं कोई ब्यूरोक्रेट है तो कोई डॉक्टर कोई इंजीनियर कोई मंत्री तो कोई संतरी पर सब एक दूसरे से विश्वविद्यालय के मालवीय सभागार में ऐसे मिल रहे थे मानो सालों पुरानी यादों को ताजा कराते फोटो एलबम से बाहर निकल कर चहलकदमी करने लगे हों। जी हां इसी में एक नाम महाराष्ट्र सरकार में मुख्य सचिव की जिम्मेदारी संभाल रहे मनु श्रीवास्तव का भी था जिन्हें वीसी आलोक राय के हाथों सम्मानित किया गया।

हालांकि काम की व्यस्तता के चलते मौके पर मनु श्रीवास्तव का आना नहीं हो सका पर उनका सम्मान उनके माता पिता को सौंपते हुए विश्वविद्यालय परिवार खुशी से फूले नहीं समा रहा था कि जिस मेधावी ने यहां से निकल कर दूसरे राज्य में सिविल सेवक के रूप में अपनी एक अलग पहचान बनाई।

ये उनके माता पिता का योगदान ही रहा कि उन्होंने अच्छे संस्कार और पढ़ाई के प्रति सच्ची लगन और मेहनत के दम पर ही कुछ हासिल करने जज्बा अपने बच्चों में बचपन से ही कूट कूट कर भरा। मनु के पिता उमाशंकर श्रीवास्तव बताते हैं कि दो भाई और दो बहनों में मनु शुरू से ही कुशाग्र बुद्धि के थे, उनकी स्कूली शिक्षा फैजाबाद गोंडा बलरामपुर में हुई जबकि हाईस्कूल और इंटरमीडिएट उन्होंने वाराणसी से किया।

बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए मनु के पिता आईपीएस उमाशंकर ने हमेशा ही साइड पोस्टिंग ही स्वीकारी, 1979 से वो लखनऊ के डालीबाग कॉलोनी में ही रहे, यहीं रहकर मनु ने लखनऊ विश्वविद्यालय से बीएससी और फिर एमएससी की। यहां भी मनु टॉपर ही रहे। 1983 में एमएससी के बाद मनु को विश्वविद्यालय के फिजिक्स विभाग में शिक्षण के लिए भी ऑफर मिला लेकिन माता पिता की सलाह पर उन्होंने सिविल सेवा की तैयारी की राह चुनी और एक साल की तैयारी के बाद 1985 में वो आईपीएस के लिए चुने गए और दूसरे ही साल 1986 में वो आईएएस में सिलेक्ट हो गए। उनकी 57 वी रैंक थी और उन्हें महाराष्ट्र कैडर मिला।

नौकरी के दौरान कोल्हापुर में तीन साल तो नागपुर में साढ़े तीन साल बतौर डीएम काम करने वाले मनु म्युनिसिपल कमिश्नर सचिव प्रमुख सचिव तो रहे ही पर राजस्व और गृह विभाग की चुनौती को बेहद खास मानते हैं वजह देश की वाणिज्यिक राजधानी होने के नाते महाराष्ट्र सरकार में इन दोनों पदों की अहमियत जरा खास भी है और अन्य राज्यों की तुलना में चुनौतीपूर्ण भी।

मौजूदा समय में मनु मुंबई राज्य के मुख्य सचिव की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। दिखावे और अहंकार से विरत बेहद मिलनसार और कड़ी मेहनत करने वाले मनु आज भी देर रात तक प्रशासनिक कार्यों को बखूबी निपटाते हैं और हां काम के बीच में जब भी मौका मिलता है मनु लखनऊ में रह रहे अपने माता पिता का हाल चाल तो जानते ही हैं साथ ही अमेरिका के बोस्टन में पढ़ रहे अपने बेटे और बेटी से भी बात कर लेते हैं।

मनु की पत्नी अर्चना उनके कामकाज में उनका पूरा सहयोग करती हैं और बताती हैं कि एक बेहद खास चीज है जो मनु को औरों से अलग और जीवन में सफल बनाती है वो है उनकी सुरीली आवाज़, जी हां है न थोड़ी हैरतअंगेज बात की एक सफल ब्यूरोक्रेट रोजाना जितने जटिल कामों को अंजाम देता है वो उतनी ही सुरीली आवाज का जादू बिखेरकर अपनों के चेहरों पर एक लंबी मुस्कान भी ला देता है।

ये राज सुनने पर यकीं नहीं हो रहा था पर जब मैंने उनकी मां के मोबाइल पर भेजे कई गाने सुने तो मुझे लगा कि ये शख्स अगर आईएएस न बनता तो यकीन मानिए मोहम्मद रफी और मुकेश सरीखा ही एक बेमिसाल सिंगर होता।

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