Navsatta
खास खबरमुख्य समाचार

सुप्रीम कोर्ट का सख्त आदेश:आवारा कुत्तों-मवेशियों से सड़कें और सार्वजनिक स्थान मुक्त होंगे

शेल्टर में रखो, वापस नहीं छोड़ो – सुरक्षा और मानवता का संतुलन
संवाददाता 
नई दिल्ली, नवसत्ता : भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को देशभर में बढ़ती आवारा पशुओं और कुत्तों की समस्या पर ऐतिहासिक और व्यापक फैसला सुनाया, जिसने जन सुरक्षा, पशु कल्याण और प्रशासनिक जवाबदेही के बीच एक मजबूत संतुलन स्थापित किया।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ (जिसमें जस्टिस संदीप मेहता और एन.वी. अंजरिया शामिल हैं) ने सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई), नगर निगमों, पंचायतों और सार्वजनिक संस्थानों को राष्ट्रीय राजमार्गों, राज्य राजमार्गों, सड़कों, स्कूलों, कॉलेजों, अस्पतालों, बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों, खेल परिसरों और अन्य सार्वजनिक स्थलों से आवारा मवेशियों (गाय, भैंस, बैल आदि) और कुत्तों को तत्काल हटाने का सख्त और समयबद्ध निर्देश दिया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन जानवरों को पकड़ने के बाद उसी स्थान पर वापस नहीं छोड़ा जाएगा, बल्कि वैज्ञानिक रूप से प्रबंधित शेल्टर होम, गौशालाओं या पशु आश्रयों में स्थानांतरित किया जाएगा, जहां उनकी नसबंदी, टीकाकरण, चिकित्सा और पोषण की पूरी व्यवस्था होगी।
कोर्ट के प्रमुख निर्देश: 
  1. राजमार्गों से मवेशी हटाओ:
    एनएचएआई और राज्य परिवहन विभाग समर्पित हाईवे गश्ती दल (Highway Patrol Teams) गठित करें। ये टीमें 24×7 सड़कों पर गश्त करेंगी, आवारा मवेशियों को पकड़ेंगी और नजदीकी गौशाला या पशु पाउंड में ले जाएंगी। कोर्ट ने कहा, “राजमार्गों पर मवेशी वाहनों के लिए घातक हथियार बन चुके हैं।”
  2. स्कूल-हॉस्पिटल से कुत्ते हटाओ:
    सभी शैक्षणिक संस्थान, अस्पताल, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, कोर्ट परिसर, पार्क और खेल मैदान पूर्ण रूप से बाड़बंदी (फेंसिंग) करें। प्रत्येक संस्थान में एक नोडल अधिकारी नियुक्त हो, जो आवारा कुत्तों की दैनिक निगरानी करे और मासिक रिपोर्ट जिला मजिस्ट्रेट को भेजे।
  3. शेल्टर में रखो, रिलीज नहीं:
    कोर्ट ने ‘कैच-न्यूटर-वैक्सीनेट-रिलीज’ मॉडल की पुरानी नीति को खारिज करते हुए कहा कि पकड़े गए कुत्तों को उसी क्षेत्र में वापस नहीं छोड़ा जाए। इसके बजाय, नए शेल्टर होम बनाए जाएं, जहां प्रति कुत्ता 10 वर्ग फुट जगह, साफ पानी, भोजन और चिकित्सा अनिवार्य हो।
  4. 8 सप्ताह में रिपोर्ट:
    सभी राज्य 15 जनवरी 2026 तक सुप्रीम कोर्ट में विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट जमा करेंगे। इसमें गठित गश्ती दलों की संख्या, पकड़े गए जानवरों की संख्या, बनाए गए शेल्टर और खर्च किया गया बजट शामिल होगा। गैर-अनुपालन पर मुख्य सचिव और डीएम पर व्यक्तिगत कार्रवाई होगी।
  5. हेल्पलाइन और जागरूकता:
    हर सार्वजनिक स्थान पर बड़ा बोर्ड लगे, जिसमें राष्ट्रीय पशु कल्याण हेल्पलाइन 1548 और स्थानीय शिकायत नंबर लिखा हो। स्कूलों में पशु कल्याण पाठ्यक्रम और ग्राम सभाओं में जागरूकता अभियान अनिवार्य।

कोर्ट का तर्क: आंकड़े और तथ्यपीठ ने फैसले में कड़े आंकड़े पेश किए:

  • एनसीआरबी 2024: कुत्ते काटने की घटनाएं 29,821 (पिछले साल से 20% अधिक)।
  • सड़क परिवहन मंत्रालय: 2023-24 में 1.5 लाख सड़क हादसे, जिनमें 15% (22,500) आवारा मवेशियों से
  • स्वास्थ्य मंत्रालय: रेबीज से सालाना 20,000 मौतें, 90% कुत्ते काटने से।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन: भारत में 3.5 करोड़ आवारा कुत्ते, केवल 5% नसबंदी

कोर्ट ने कहा, “बच्चे स्कूल जाते समय डरते हैं, मरीज अस्पताल में असुरक्षित हैं, यात्री बस स्टैंड पर घबराते हैं। यह स्थिति अस्वीकार्य है।” साथ ही, पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960, एबीसी नियम 2023 और भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का हवाला देते हुए कहा कि **”मानव और पशु दोनों का अधिकार संरक्षित होना चाहिए।”*पृष्ठभूमि: लंबी कानूनी लड़ाईयह मामला जुलाई 2025 में स्वत: संज्ञान (सुओ मोटो) से शुरू हुआ, जब दिल्ली, मुंबई, लखनऊ और पटना से कुत्ते काटने की खबरें सुर्खियों में आईं। अगस्त 2025 में पहला आदेश आया, जिसमें नसबंदी और टीकाकरण पर जोर था, लेकिन रिलीज पॉलिसी की वजह से समस्या बनी रही। अमाइकस क्यूरी (वरिष्ठ वकील गौरव कुमार बंसल) ने शेल्टर-आधारित मॉडल का सुझाव दिया, जिसे कोर्ट ने स्वीकार किया। एनजीओ ह्यूमेन सोसाइटी, पीपल फॉर एनिमल्स और पशु चिकित्सक संघ ने भी हस्तक्षेप किया।

 अवसर और चुनौतियां
पहलू
सकारात्मक प्रभाव
चुनौतियां
सुरक्षा
सड़क हादसे 10-15% कम, रेबीज नियंत्रण
शेल्टर की कमी (केवल 300, जरूरत 5,000+)
पशु कल्याण
मानवीय देखभाल, नसबंदी से जनसंख्या नियंत्रण
बजट: 2025-26 में मात्र 1,000 करोड़
प्रशासन
गश्ती दल, नोडल अधिकारी, हेल्पलाइन
निकायों की अक्षमता, भ्रष्टाचार का खतरा
सामाजिक
बच्चों-महिलाओं में सुरक्षा का भाव
किसानों का विरोध (मवेशी खुला छोड़ने की परंपरा)

राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव

  • भाजपा शासित राज्य (उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात): इसे “सुरक्षा अभियान” के रूप में प्रचारित कर रहे हैं। यूपी में 1,000 नए गौशाला की घोषणा।
  • विपक्षी राज्य (बिहार, बंगाल): इसे “केंद्र का दबाव” बता सकते हैं, लेकिन अनुपालन मजबूरी।
  • एनजीओ: स्वागत, लेकिन शेल्टर की गुणवत्ता पर निगरानी की मांग।
  • नागरिक: सोशल मीडिया पर #SafeStreetsNoStrays ट्रेंडिंग।

क्या हो सकता है आगे?

  • 2026 तक: यदि 50% अनुपालन हुआ, तो रेबीज 30% कम, हादसे 12% कम
  • जनवरी 2026: कोर्ट की अगली सुनवाई, राज्यों की रिपोर्ट पर फैसला।
  • केंद्र की भूमिका: राष्ट्रीय आवारा पशु प्रबंधन मिशन की घोषणा संभव।

नागरिकों की भूमिका

  • 1548 पर कॉल करें यदि आवारा कुत्ता/मवेशी दिखे।
  • स्थानीय निकाय पर दबाव डालें शेल्टर बनाने को।
  • पशु दत्तक ग्रहण करें, जागरूकता फैलाएं।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांति की शुरुआत है। यह हमें सिखाता है कि विकास का मतलब केवल सड़कें और इमारतें नहीं, बल्कि सुरक्षित, स्वच्छ और संवेदनशील समाज भी है। अब गेंद सरकारों, निकायों और नागरिकों के पाले में है। 8 सप्ताह बाद कोर्ट पूछेगा – कितना किया? जवाब तैयार रखें।

संबंधित पोस्ट

नहीं रहे मशहूर फिल्म निर्माता मोहम्मद रियाज

navsatta

मृतक सफाईकर्मी के परिजनों से मुलाकात करने जा रही प्रियंका गांधी हिरासत में

navsatta

दिल्ली AIIMS से 4 करोड़ मरीजों का डेटा चोरी

navsatta

Leave a Comment