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एक कप गरमा-गरम चाय की चुस्की और मजबूत संबंध

चाय  के दिवाने कल मनाएंगे चाय दिवस

लखनऊ, नवसत्ताः  4,750 वर्ष पहले सम्राट शेन नोंग ने जब चाय की आकस्मिक खोज की, तब उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि उनकी यह खोज एक दिन न सिर्फ दो लोगों के संबंधों के सृजन, बल्कि उन्हें मजबूत करने का एक प्रतिभाशाली सूत्र बन जाएगी। आज के डिजिटल युग में, जहाँ लोग अक्सर अपने फोन और ई-मेल के माध्यम से अपनी व्यस्तता की परिभाषा बुनते हैं, एक कप चाय और उसकी चुस्की में किसी की भागदौड़ भरी जिंदगी में कुछ पल की राहत पाने, थोड़ा-सा समय चुराने और एक साझा अनुभव बनाने की ताकत होती है।

एक राजनीतिक रणनीतिकार और पीआर कंसल्टेंट होने के नाते, मैं हमेशा मजबूत व्यावसायिक संबंधों के निर्माण के महत्व पर जोर देता हूँ। मेरा मानना है कि एक साझा अनुभव ही सफल रिश्ते स्थापित करने की कुँजी हैं, और इसे सूत्र में बाँधने के लिए एक कप चाय की चुस्की से बेहतर और कुछ भी नहीं हो सकता है।

कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि व्यस्त दिनचर्या का एक-एक दिन काम के सिलसिले में ही बीत जाया करता है, और सालभर में कुछेक बार ही अपनों से और व्यवसाय आदि से जुड़े व्यक्तियों से मिलना हो पाता है। मेरे पास जब भी किसी का कॉल आता है, तो हाल-चाल जानने के बाद मेरा उनसे एक ही सवाल होता है, “और, चाय पर कब मिल रहे हों?” बेशक, वे भी अपनी दिनचर्या में व्यस्त हैं, लेकिन चाय उन्हें निकट भविष्य में मुलाकात करने के लिए बाँध देती है और हमें विशेष समय मिल जाता है साझा करने के लिए।

चाय की एहमियत का एहसास मुझे तब हुआ, जब पिछले पाँच वर्षों से पुराने दोस्त से किसी पुरानी गलतफहमी को लेकर बातचीत बंद थी। वह मुंबई और मैं इंदौर में रहता हूँ। दोनों अपने-अपने कामों में व्यस्त रहते हैं। एक दिन सहज ही उसका फोन आया, मैंने जैसे ही उसका फोन उठाया, वह कहता है, “काम के सिलसिले में इंदौर आया हूँ। तू कहे, तो चाय पर मिले?” उसने मुझसे ऐसे बात की जैसे कुछ हुआ ही न हो। मैं कुछ पल के लिए थम गया और बीती बातें, जो मैं इतने वर्षों से पालकर बैठा था, सब भूलकर उसे मेरे दफ्तर में चाय के लिए आमंत्रित किया। चाय की कीमत मुझे उस दिन समझ आई, जिसकी सुगंध एक घंटे साथ में बैठने के बाद भी बरकरार थी। पुराने सभी गिले-शिकवे दूर हो गए और हमने साथ मिलकर काम करने के लिए एक बिज़नेस प्लान किया।

चाय दूसरों के साथ खुलकर पेश आने, बातचीत शुरू करने और अंततः मजबूत संबंध स्थापित करने की अद्भुत कला है। चाहे बात इन्फॉर्मल वन-ऑन-वन मीटिंग की हो या फिर किसी मुद्दे पर लम्बी बैठक की, चाय का एक गरमा-गरम कप कई विचारों को सामने वाले के समक्ष रखने और व्यक्तिगत संबंध मजबूत करना बेहद आसान बना सकता है। तनावपूर्ण बैठकों में, जहाँ एक तरफ इसकी सुगंध मूड को हल्का कर देती है, वहीं दूसरी तरफ एम्प्लॉयीज़ को बिज़नेस कन्वर्सेशन में समान रूप से हिस्सा लेने के साथ ही साथ अपने अनूठे विचारों को सामने रखने में यह खूब मदद करती है।

डिजिटल युग की तेजी से भागती-दौड़ती जिंदगी में कुछ पल ठहरकर राहत की साँस लेने की कला का दूसरा नाम चाय है। काम से लेकर व्यक्तिगत मामलों तक हर बात पर चर्चा करने का सटीक जरिया चाय है और यहाँ तक कि अजनबियों के बीच मजबूत दोस्ती बनाने में भी चाय खूब बढ़िया भूमिका अदा करती है।

सबसे महत्वपूर्ण बात, जो चाय हमें सिखाती है, वह यह है कि सही इंग्रेडिएंट्स और थोड़े धैर्य का उपयोग करके जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है। जिस तरह इंग्रेडिएंट्स का एक गलत हिसाब और जल्दबाजी चाय का स्वाद खराब कर देती है, उसी तरह जिंदगी के गलत फैसले भी चाय का स्वाद बिगाड़ देते हैं। जरुरत है, तो सिर्फ धैर्य रखते हुए बातों को सँभालने की, क्योंकि बेहतरी से तैयार होने और अच्छा स्वाद देने के लिए चाय को भी तपना पड़ता है, जितनी अधिक तपती है, स्वाद में उतनी ही खरी होती है चाय, यही जीवन और संबंधों की भी कहानी है।

– अतुल मलिकराम

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